
गणेश पंडाल में दर्शन करने गई एक होनहार छात्रा की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि अचानक चालू हुए डीजे (DJ) के कानफोड़ू बेस और कंपन को उसका दिल सह नहीं पाया।
क्या हमारी आस्था और उत्सव अब दूसरों की जान से बड़े हो गए हैं? कान के पर्दे फाड़ देने वाला शोर और छाती को झकझोर देने वाला तेज बेस कतई भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। यह भक्ति नहीं, जानलेवा प्रदर्शन है। आज एक घर का चिराग बुझा है, कल कोई और परिवार इसका शिकार हो सकता है।
धार्मिक और सार्वजनिक आयोजनों में सीमा से अधिक ध्वनि वाले डीजे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। हम सभी को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है—त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, मातम फैलाने के लिए नहीं।
दिवंगत बिटिया को भावभीनी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।